Jangal Ka Dard By Ved Prakash Dubey
जंगल
का दर्द
द्वारा : डॉ. वेद प्रकाश दुबे
प्रकाशन : TRUE SIGN पब्लिशिंग
डॉ. वेद प्रकाश दुबे द्वारा रचित पुस्तक जंगल का दर्द पर्यावरण पर केन्द्रित एक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण जानकारी से युक्त पुस्तक है। आम तौर पर ऐसे विषयों पर लिखी गयी पुस्तकों को पाठ्यक्रम की पुस्तक अथवा बेहद उबाऊ किस्म के साहित्य की श्रेणी में रखा जाता है किन्तु डॉ. वेद प्रकाश दुबे द्वारा रचित यह पुस्तक इस मान्यता को सिरे से खारिज करती हुयी सरस एवं रोचक रचना है ।
पुस्तक में वन, जल , वन्य जीव ,
वनस्पति , पर्वतीय खनिज संपदा , नदियों में प्रदूषण इत्यादि पर्यावरण से सम्बंधित
विषयों पर तथ्य परक एवं तर्क परक प्रस्तुति दी गयी है। पुस्तक अकेले
जंगल के दर्द की बात न कह कर सम्पूर्ण पर्यावरण का दर्द बखान करती है । पुस्तक अत्यंत रोचकता से पाठक को अपने संग
सम्बद्ध रखने में सक्षम है। पुस्तक की कथन शैली एवं वाक्य विन्यास प्रभाव निर्मित
करने में सक्षम हैं।
मानव का प्रकृति से बहुत गहरा और मधुर संबंध प्राचीन काल से ही रहा है।
भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, वनों और प्रत्येक
जीव-जन्तुओं को दैविक अधिकार प्रदान करती रही है।
धरती पर इंसान और वनों का सह-अस्तित्व प्रकृति प्रदत्त है। वन मनुष्य के
साथ-साथ अनेक जीव प्रजातियां, औषधियों, फलदार वृक्षों के आश्रय स्थल होते हैं वो वायुमंडल के प्रदूषण को दूर करने
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मनुष्य भूल जाता है कि प्रकृति के संसाधनों पर
सभी का बराबर अधिकार है।
आज आवश्यकता है की हमें पुनः वृक्षों एवं अन्य जीवों में देवत्व के तथ्य को
स्वीकार करते हुए अपनी धरती और पर्यावरण की रक्षा खातिर वनों का विस्तार एवं पर्यावरण की रक्षा
करनी होगी ।
वन एवं पर्यावरण की महत्ता को विस्तार से परिभाषित करते हुए भविष्य हेतु
महत्वपूर्ण सुझाव देती है पुस्तक जंगल का दर्द।
पुस्तक में पुरातन काल से जंगलों की आवश्यकता एवं समृद्धता को मानवता से
जोड़ कर उनकी अनिवार्यता को गहनता से विचारित किया गया है। रामायण ,महाभारत जैसे ग्रंथों में भी जंगलों की
महत्ता विशेष रूप से दर्शायी गयी है।
जंगलों से मानव क्या नहीं प्राप्त
करता वह भोजन, लकड़ी, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव,
पर्यावरण की शुद्धता, प्रदूषण से बचाव,
भूमि संरक्षण , औषधि इत्यादि में जंगल की और जंगल से सम्बद्ध
विभिन्न सुलभ सामग्रियों के ऊपर निर्भर करता है। संभवतः यही कारण था, कि जंगल की महत्ता को देखते हुए भारतीय संस्कृति में विशेष रूप से वनों को
देवतुल्य स्थान दिया है। जीवन को सफल
बनाने के लिए , दुःखों से मुक्ति एवं मोक्ष व निर्वाण पाने
के लिए 'वानप्रस्थ आश्रम' पर ही विशवास
व्यक्त किया ।
जंगलों की कटाई के विषय में भी अत्यंत विस्तृत विमर्श है । वे कहते हैं कि जबसे जंगल और वृक्ष बेदर्दी से
काटे गए हैं तबसे कई समस्याएं बराबर मनुष्यता पर गहराती गई हैं। आदमी को ऐसी
समस्याओं से जूझना पड़ा है, जो उसने कभी सोची ही नहीं थी । वृक्षों, पेड़-पौधों ने
हमेशा ही हरेक शख्स को वो दिया है जिस भावना से वो वहां आया है वृक्षों की छांव
में जीवन के चरम सत्यों की तलाश में यदि कोई आया तो उसे वहां भी सहारा मिला है ।
किसी को दवाई, जड़ी-बूटी, किसी को शांति, किसी को लकड़ी तो किसी को एकांत नीरवता भरी गहन शांति की तलाश जंगल में ले
जाती है और उसे यह सब चीजें वहां से प्राप्त भी होती हैं। जंगलों की कटाई के रूप में मानव ने जो अत्याचार
किये हैं वही अत्याचार आज उस के सामने उसी के दर्द रूप में खड़ा है कई वन्य
पशुओं की जातियां ही लुप्त हो गई हैं तथा कुछ लुप्त होने की ओर अग्रसर हैं। ऐसे
में आदमी को अपने जंगल के प्रति किये अत्याचार का अहसास हो रहा है । और यही कारण
है कि पूरी मनुष्यता आज पर्यावरण बचाओ व वृक्ष लगाओ अभियान की ओर मुड़ चुकी है। 'पृथ्वी दिवस' मनाया जा रहा है ।
मनुष्य इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना है और प्रकृति, वनस्पति, वृक्ष, जंगल, पेड़-पौधे उसके जीवन के परमआवश्यक तत्त्व हैं,
जो सृष्टि के आरंभ से ही उसके जीवन और चिंतन को नई गति, नई दिशा, नई ऊर्जा और नया धरातल प्रदान करते आ रहे
हैं । वृक्ष भी इन्हीं पांच तत्त्वों से मिलकर बनते हैं और इंसान भी । इसलिए दोनों
के पारस्परिक विशिष्ठ संबंध हैं एवं दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही
एक-दूसरे के बिना जी नहीं सकते हैं।
आगे जल की उपलब्धता एवं नदियों के प्रदूषण पर भी विस्तार से चर्चा करते हैं कि जल तो जीवन की बुनियादी आवश्यकता है, अगर हम उसे ही प्रदूषित कर देंगे तो भला हमारा जीवन चलेगा कैसे। नदियां न हों तो जीवन समाप्त हो जायेगा। नदियां आर्थिक और सामाजिक आधार मजबूत करती हैं। प्रकृति अपनी व्यवस्था में अनुचित हस्तक्षेप करने वालों को कभी माफ नहीं करती है । यही कारण है कि आज जैसे-जैसे आदमी पर्यावरण के प्रति क्रूर होता गया है, वैसे ही रोज नई बीमारियां, महामारियां, प्राकृतिक विपत्तियां आदमी को खाए जा रही हैं। इस पर भी हमारी आँखें नहीं खुल रहीं हैं ।
वन जीवों के संरक्षण , उनकी उपयोगिता व् पर्यावरण संतुलन हेतु उनकी
आवश्यकता पर भी विस्तृत चर्चा पुस्तक में की गयी है। आधुनिक मनुष्य के सबसे बड़े अत्याचारी कार्यों
में से सर्वाधिक अमानुषिक और घृणित कार्य है “निरीह भोले-भाले सुंदर वन्य
प्राणियों की निर्मम नृशंस हत्या करना, उनकी खाल खींच लेना,
उनकी हड्डियां और दांतों को बेचकर धन कमाना ।" यह एक ऐसा
अमानवीय अपराध है, जिसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए वह कम है
।
यही कारण है आज कई वन्य प्राणियों की नस्लें ही लुप्त हो रही हैं । इंसान से
सर्वप्रथम अपेक्षित है कि वह इन निरीह भोले-भाले वन्य जीवों की हत्या बंद कर दे और
इंसानियत की राह पर चलना सीखे तभी वह ईश्वर का प्रेम प्राप्त कर पायेगा । वरना
नहीं। यूं तो इस संबंध में कई कानून भी हैं परंतु इंसान की नीयत यही बन गई है कि
वह कानूनों की धज्जियां उड़ाये तथा मनमानी करे और आज ऐसी मनमानी पूरी ही धरती पर
हो रही है यह किये वगैर हम पर्यावरण संतुलन कायम नहीं रख पायेंगे ।
इस संबंध में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 (क)
भी ध्यान देने योग्य है । उसमें कहा गया है कि यह नागरिकों का कर्त्तव्य होगा कि
वह नदियों, वन्य प्राणियों, वनस्पतियों
से पर्यावरण की सुरक्षा हेतु सहानुभूति रखें और उनकी सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी है।
आज पर्यावरण की रक्षा के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह पर्यावरण के प्रति अपनी
सामाजिक जागृति तथा सृजनात्मकता की जिम्मेदारी भली-भांति निभाये और अधिक से अधिक भूमि
में वन उगाए । तभी हमारी समूची धरती हरी-भरी चादर से अपना शरीर ढक सकेगी और जीवन
रंग-बिरंगी छटाओं से महकेगा और हर इंसान सही मायने में अपना इंसान होना सार्थक
सिद्ध कर पायेगा ।
पुस्तक जहाँ वनों की , जल संसाधनों की , वन्य प्राणियों की रक्षा , उनके
योगदान के विषय में विस्तार से सहज एवं सरल बोधगम्य भाषा में अपनी बात रखती है वही
कथन इस शैली में कहे गए हैं जो उपदेशात्मक न होकर सुझाव रूप में हैं एवं सहज ही
ध्यान आकर्षित करते हैं। पुस्तक के संग
कुछ चित्र पुस्तक को और अधिक आकर्षक बनाने में योगदान दे सकते थे।
कहना ही होगा की एक अल्प चर्चित एवं अछूते से विषय पर एक सुन्दर रचना
प्रस्तुत कर पर्यावरण एवं साहित्य में विशिष्ठ योगदान दिया है।
सविनय
अतुल्य



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें